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mahabharat 13.103.38: इसके बाद मैं तुम्हें धूप जलाने की विधि का फल बताऊँगा। धूप कई प्रकार की होती है, अच्छी और बुरी। उनका वर्णन मुझसे सुनो। 38.   |   mahabharat अध्याय 13.103: तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.103.38 
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि धूपदानविधे: फलम्।
धूपांश्च विविधान् साधूनसाधूंश्च निबोध मे॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद मैं तुम्हें धूप जलाने की विधि का फल बताऊँगा। धूप कई प्रकार की होती है, अच्छी और बुरी। उनका वर्णन मुझसे सुनो। 38.
 
After this I will tell you the result of the method of burning incense. There are many kinds of incense, good and bad. Listen to their description from me. 38.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)