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mahabharat 13.103.37: यदि देवताओं को सदैव प्रसन्न और आदरपूर्वक रखा जाए, तो वे भी मनुष्यों को संतोष और आदर देते हैं और यदि उनकी अवज्ञा और उपेक्षा की जाए, तो वे अवज्ञाकारी नीच मनुष्यों को अपनी क्रोधाग्नि में भस्म कर देते हैं ॥37॥   |   mahabharat अध्याय 13.103: तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.103.37 
प्रीता: प्रीणन्ति सततं मानिता मानयन्ति च।
अवज्ञातावधूताश्च निर्दहन्त्यधमान् नरान्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
यदि देवताओं को सदैव प्रसन्न और आदरपूर्वक रखा जाए, तो वे भी मनुष्यों को संतोष और आदर देते हैं और यदि उनकी अवज्ञा और उपेक्षा की जाए, तो वे अवज्ञाकारी नीच मनुष्यों को अपनी क्रोधाग्नि में भस्म कर देते हैं ॥37॥
 
If the Gods are always pleased and respected, they too give satisfaction and respect to human beings. And if they are disobeyed and ignored, they destroy the disobedient lowly human beings in the fire of their anger. ॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)