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mahabharat 13.103.32: हे प्रभु! मनुष्यों को वे ही पुष्प प्रिय होते हैं जिनका रूप और रंग सुन्दर हो, जिनका रस विशेष मधुर हो और जो देखने पर हृदय को प्रिय लगते हों ॥32॥   |   mahabharat अध्याय 13.103: तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 103: तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  13.103.32 
मनोहृदयनन्दिन्यो विशेषमधुराश्च या:।
चारुरूपा: सुमनसो मानुषाणां स्मृता विभो॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! मनुष्यों को वे ही पुष्प प्रिय होते हैं जिनका रूप और रंग सुन्दर हो, जिनका रस विशेष मधुर हो और जो देखने पर हृदय को प्रिय लगते हों ॥32॥
 
O Lord! Human beings love only those flowers whose appearance and colour are beautiful, whose juice is especially sweet and which seem pleasing to the heart when seen. ॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)