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mahabharat 13.103.25: मैं उन औषधियों का भी वर्णन कर रहा हूँ जो दैत्यों, नागों, यक्षों, मनुष्यों और पितरों को प्रिय और प्रसन्न करने वाली हैं। सुनो। 25।   |   mahabharat अध्याय 13.103: तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.103.25 
रक्षसामुरगाणां च यक्षाणां च तथा प्रिया:।
मनुष्याणां पितॄणां च कान्तायास्त्वनुपूर्वश:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
मैं उन औषधियों का भी वर्णन कर रहा हूँ जो दैत्यों, नागों, यक्षों, मनुष्यों और पितरों को प्रिय और प्रसन्न करने वाली हैं। सुनो। 25।
 
I am also describing the medicines which are liked and delighted by the demons, serpents, yakshas, ​​humans and the ancestors. Listen. 25.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)