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mahabharat 13.103.22: हे प्रभु! हे दैत्यराज! जिस भी देवता को पुष्प अर्पित किए जाते हैं, वे दाता पर अत्यंत प्रसन्न होते हैं और उसके कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहते हैं ॥22॥   |   mahabharat अध्याय 13.103: तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.103.22 
यं यमुद्दिश्य दीयेरन् देवं सुमनस: प्रभो।
मंगलार्थं स तेनास्य प्रीतो भवति दैत्यप॥ २२॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! हे दैत्यराज! जिस भी देवता को पुष्प अर्पित किए जाते हैं, वे दाता पर अत्यंत प्रसन्न होते हैं और उसके कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहते हैं ॥22॥
 
Lord! O King of Demons! Whichever deity is being offered flowers, he becomes extremely pleased with the donor and remains alert for his well-being. ॥22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)