श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 102: गृहस्थधर्म, पञ्चयज्ञ-कर्मके विषयमें पृथ्वीदेवी और भगवान‍् श्रीकृष्णका संवाद  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  13.102.25 
एतद् गृहस्थधर्मं त्वं चेष्टमानो जनाधिप।
इहलोके यश: प्राप्य प्रेत्य स्वर्गमवाप्स्यसि॥ २५॥
 
 
अनुवाद
जनेश्वर! इस गृहस्थ-धर्म का पालन करने से तुम्हें इस लोक में कल्याण और परलोक में स्वर्ग की प्राप्ति होगी।
 
Janeshwar! By following this householder-dharma, you will attain prosperity in this world and heaven in the next world.
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि बलिदानविधिर्नाम सप्तनवतितमोऽध्याय:॥ ९७॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बलिदानविधि नामक सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)