श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 102: गृहस्थधर्म, पञ्चयज्ञ-कर्मके विषयमें पृथ्वीदेवी और भगवान‍् श्रीकृष्णका संवाद  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  13.102.1 
युधिष्ठिर उवाच
गार्हस्थ्यं धर्ममखिलं प्रब्रूहि भरतर्षभ।
ऋद्धिमाप्नोति किं कृत्वा मनुष्य इह पार्थिव॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले - भरतश्रेष्ठ! पृथ्वीनाथ! अब आप कृपा करके मुझे गृहस्थाश्रम का सम्पूर्ण धर्म सिखाइए। इस लोक में कौन-सा कर्म करने से मनुष्य ऐश्वर्य का भागी होता है? 1॥
 
Yudhishthir said – Bharatshreshtha! Prithvinath! Now please teach me the entire religion of Grihastha-Ashram. By doing which work does a man become a part of prosperity in this world? 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)