श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 101: सरोवर खोदाने और वृक्ष लगानेका माहात्म्य  »  श्लोक d23
 
 
श्लोक  13.101.d23 
पुष्पै: सुरगणान् वृक्षा: फलैश्चापि तथा पितॄन्॥
छायया चातिथींस्तात पूजयन्ति महीरुहा:।
 
 
अनुवाद
हे पिता! वृक्ष सदैव अपने फूलों से देवताओं की, अपने फलों से पूर्वजों की तथा अपनी छाया से अतिथियों की पूजा करते हैं।
 
Father! Trees always worship the gods with their flowers, ancestors with their fruits and guests with their shade.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)