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mahabharat 13.10.47: राजा ने कहा, "हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! मैं आपको एक तो क्या, सौ वरदान भी दे सकता हूँ। आपके प्रति मेरे मन में जो प्रेम और विशेष आदर है, उसे देखते हुए मेरे पास आपके लिए कुछ भी शेष नहीं है।"   |   mahabharat अध्याय 13.10: अनधिकारीको उपदेश देनेसे हानिके विषयमें एक शूद्र और तपस्वी ब्राह्मणकी कथा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.10.47 
राजोवाच
वराणां ते शतं दद्यां किं बतैकं द्विजोत्तम।
स्नेहाच्च बहुमानाच्च नास्त्यदेयं हि मे तव॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
राजा ने कहा, "हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! मैं आपको एक तो क्या, सौ वरदान भी दे सकता हूँ। आपके प्रति मेरे मन में जो प्रेम और विशेष आदर है, उसे देखते हुए मेरे पास आपके लिए कुछ भी शेष नहीं है।"
 
The king said, "O great Brahmin! I can grant you a hundred boons, let alone one. Considering the love and special respect I have for you, I have nothing left for you." 47.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)