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mahabharat 13.10.34-35h: तदनन्तर दीर्घकाल तक तपस्या करने के पश्चात् उस शूद्र तपस्वी ने वन में प्राण त्याग दिए और उन्हीं पुण्यों के प्रभाव से वह एक महान् वंश में अत्यन्त तेजस्वी बालक के रूप में उत्पन्न हुआ।   |   mahabharat अध्याय 13.10: अनधिकारीको उपदेश देनेसे हानिके विषयमें एक शूद्र और तपस्वी ब्राह्मणकी कथा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 10: अनधिकारीको उपदेश देनेसे हानिके विषयमें एक शूद्र और तपस्वी ब्राह्मणकी कथा  »  श्लोक 34-35h
 
 
श्लोक  13.10.34-35h 
अथ दीर्घस्य कालस्य स तप्यन् शूद्रतापस:।
वने पञ्चत्वमगमत् सुकृतेन च तेन वै॥ ३४॥
अजायत महाराजवंशे स च महाद्युति:।
 
 
अनुवाद
तदनन्तर दीर्घकाल तक तपस्या करने के पश्चात् उस शूद्र तपस्वी ने वन में प्राण त्याग दिए और उन्हीं पुण्यों के प्रभाव से वह एक महान् वंश में अत्यन्त तेजस्वी बालक के रूप में उत्पन्न हुआ।
 
Thereafter, after performing penance for a long time, that Shudra ascetic died in the forest and due to the effect of the same good deeds, he was born as a very brilliant child in a great dynasty. 34 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)