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mahabharat 13.10.25-26: भरतभूषण श्रेष्ठ हैं ! तत्पश्चात उन्होंने अनुकूल वचन कहे और उनके आगमन का वृत्तांत पूछा । तब से वे परम तेजस्वी और कठोर व्रत का पालन करने वाले धर्मज्ञ ऋषि उस शूद्र के आश्रम में उससे मिलने के लिए अनेक बार आये ॥25-26॥   |   mahabharat अध्याय 13.10: अनधिकारीको उपदेश देनेसे हानिके विषयमें एक शूद्र और तपस्वी ब्राह्मणकी कथा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 10: अनधिकारीको उपदेश देनेसे हानिके विषयमें एक शूद्र और तपस्वी ब्राह्मणकी कथा  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  13.10.25-26 
अनुकूला: कथा: कृत्वा यथागतमपृच्छत।
ऋषि: परमतेजस्वी धर्मात्मा संशितव्रत:॥ २५॥
एवं सुबहुशस्तस्य शूद्रस्य भरतर्षभ।
सोऽगच्छदाश्रममृषि: शूद्रं द्रष्टुं नरर्षभ॥ २६॥
 
 
अनुवाद
भरतभूषण श्रेष्ठ हैं ! तत्पश्चात उन्होंने अनुकूल वचन कहे और उनके आगमन का वृत्तांत पूछा । तब से वे परम तेजस्वी और कठोर व्रत का पालन करने वाले धर्मज्ञ ऋषि उस शूद्र के आश्रम में उससे मिलने के लिए अनेक बार आये ॥25-26॥
 
Bharatbhushan is the best! After that he spoke favorably and asked about the story of their arrival. Since then, that most brilliant and religious sage who followed a strict fast came to that Shudra's ashram many times to meet him. 25-26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)