भीष्म उवाच
एवमुक्तस्तु मुनिना स शूद्रोऽचिन्तयन्नृप।
कथमत्र मया कार्यं श्रद्धा धर्मपरा च मे॥ १८॥
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं - हे पुरुषों के स्वामी! जब मुनि ने ऐसा कहा, तब शूद्र ने सोचा कि मैं यहाँ क्या करूँ? मेरी श्रद्धा तो केवल संन्यास के कर्तव्यों के पालन में है॥18॥
Bhishmaji says - O Lord of men! When the sage said this, the shudra thought, what should I do here? My faith is only for performing the duties of Sannyas.॥ 18॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥