कुलपतिरुवाच
न शक्यमिह शूद्रेण लिङ्गमाश्रित्य वर्तितुम्।
आस्यतां यदि ते बुद्धि: शुश्रूषानिरतो भव॥ १६॥
शुश्रूषया पराँल्लोकानवाप्स्यसि न संशय:॥ १७॥
अनुवाद
कुलगुरु ने कहा, "इस आश्रम में कोई भी शूद्र संन्यास का चिह्न धारण करके नहीं रह सकता। यदि तुम यहाँ रहना चाहते हो, तो इसी प्रकार रहो और ऋषियों-मुनियों की सेवा करो। उनकी सेवा करने से ही तुम्हें उत्तम लोक की प्राप्ति होगी, इसमें संदेह नहीं है।" 16-17.
The Chancellor said, "No Shudra can live in this ashram wearing the symbol of sannyas. If you wish to stay here, then stay like this and serve the sages and saints. There is no doubt that you will attain the best world only by serving them." 16-17.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥