श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 10: अनधिकारीको उपदेश देनेसे हानिके विषयमें एक शूद्र और तपस्वी ब्राह्मणकी कथा  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  13.10.13 
अथास्य बुद्धिरभवत् तपस्ये भरतर्षभ।
ततोऽब्रवीत् कुलपतिं पादौ संगृह्य भारत॥ १३॥
 
 
अनुवाद
भरत! हे भरतभूषण! उनके मन में वहाँ तपस्या करने का विचार उत्पन्न हुआ, अतः उन्होंने कुलगुरु के चरण पकड़ लिए और कहा -॥13॥
 
Bharata! O Bharatabhushan! The thought of performing tapasya there arose in his mind; therefore, he held the feet of the Chancellor and said -॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)