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mahabharat 13.10.1-2: युधिष्ठिर ने पूछा- पितामह! यदि कोई नीच जाति के व्यक्ति को मित्रता या सौहार्द के प्रसंग में उपदेश दे, तो क्या उस राजा को दोष लगेगा या नहीं? मैं इस विषय को यथार्थ रूप में जानना चाहता हूँ। कृपया इसे विस्तारपूर्वक समझाएँ; क्योंकि धर्म की गति सूक्ष्म है, जहाँ लोग उलझ जाते हैं॥1-2॥   |   mahabharat अध्याय 13.10: अनधिकारीको उपदेश देनेसे हानिके विषयमें एक शूद्र और तपस्वी ब्राह्मणकी कथा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 10: अनधिकारीको उपदेश देनेसे हानिके विषयमें एक शूद्र और तपस्वी ब्राह्मणकी कथा  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  13.10.1-2 
युधिष्ठिर उवाच
मित्रसौहार्दयोगेन उपदेशं करोति य:।
जात्याधरस्य राजर्षेर्दोषस्तस्य भवेन्न वा॥ १॥
एतदिच्छामि तत्त्वेन व्याख्यातुं वै पितामह।
सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य यत्र मुह्यन्ति मानवा:॥ २॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा- पितामह! यदि कोई नीच जाति के व्यक्ति को मित्रता या सौहार्द के प्रसंग में उपदेश दे, तो क्या उस राजा को दोष लगेगा या नहीं? मैं इस विषय को यथार्थ रूप में जानना चाहता हूँ। कृपया इसे विस्तारपूर्वक समझाएँ; क्योंकि धर्म की गति सूक्ष्म है, जहाँ लोग उलझ जाते हैं॥1-2॥
 
Yudhishthira asked- Grandfather! If someone preaches to a person of a lower caste in the context of friendship or cordiality, will that king be blamed or not? I want to know this matter in its true form. Please explain it in detail; because the movement of Dharma is subtle, where people get entangled.॥1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)