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mahabharat 13.1.65: मृत्यु बोली- शिकारी! हम दोनों ही विवश हैं क्योंकि हम काल के वश में हैं। हम तो केवल उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। यदि तुम भली-भाँति विचार करोगे तो हमें दोष नहीं दोगे।   |   mahabharat अध्याय 13.1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  13.1.65 
मृत्युरुवाच
विवशौ कालवशगावावां निर्दिष्टकारिणौ।
नावां दोषेण गन्तव्यौ यदि सम्यक् प्रपश्यसि॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
मृत्यु बोली- शिकारी! हम दोनों ही विवश हैं क्योंकि हम काल के वश में हैं। हम तो केवल उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। यदि तुम भली-भाँति विचार करोगे तो हमें दोष नहीं दोगे।
 
Mrityu said- Hunter! We both are helpless because we are under the control of time. We only follow his orders. If you think well then you will not blame us.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)