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mahabharat 13.1.63: तुम और मृत्यु दोनों ही इस बालक के नाश के कारण हो; इसलिए मैं उन दोनों को ही कारण या अपराधी मानता हूँ और उनमें से किसी को भी दोषी या निर्दोष नहीं मानता ॥ 63॥   |   mahabharat अध्याय 13.1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  13.1.63 
मृत्युस्त्वं चैव हेतुर्हि बालस्यास्य विनाशने।
उभयं कारणं मन्ये न कारणमकारणम्॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
तुम और मृत्यु दोनों ही इस बालक के नाश के कारण हो; इसलिए मैं उन दोनों को ही कारण या अपराधी मानता हूँ और उनमें से किसी को भी दोषी या निर्दोष नहीं मानता ॥ 63॥
 
You and death are both the causes of this child's destruction; therefore I consider both of them as the cause or culprit and do not consider any one of them as guilty or innocent. ॥ 63॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)