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mahabharat 13.1.58: साँप बोला - हे मरे हुए! मैं न तो तुझे निर्दोष ठहरा रहा हूँ, न दोषी। मैं तो केवल इतना कह रहा हूँ कि तूने ही मुझे इस बालक को डसने के लिए प्रेरित किया।   |   mahabharat अध्याय 13.1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  13.1.58 
सर्प उवाच
निर्दोषं दोषवन्तं वा न त्वां मृत्यो ब्रवीम्यहम्।
त्वयाहं चोदित इति ब्रवीम्येतावदेव तु॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
साँप बोला - हे मरे हुए! मैं न तो तुझे निर्दोष ठहरा रहा हूँ, न दोषी। मैं तो केवल इतना कह रहा हूँ कि तूने ही मुझे इस बालक को डसने के लिए प्रेरित किया।
 
The snake said - O dead one! I am neither declaring you innocent nor guilty. I am only saying that you inspired me to bite this boy. 58.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)