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mahabharat 13.1.57: साँप! इतना सब कुछ जानते हुए भी तुम मुझे दोषी कैसे ठहरा सकते हो? और अगर ऐसी स्थिति में भी मुझे दोषी ठहराया जा सकता है, तो तुम भी दोषी हो।   |   mahabharat अध्याय 13.1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  13.1.57 
एवं ज्ञात्वा कथं मां त्वं सदोषं सर्प मन्यसे।
अथ चैवंगते दोषे मयि त्वमपि दोषवान्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
साँप! इतना सब कुछ जानते हुए भी तुम मुझे दोषी कैसे ठहरा सकते हो? और अगर ऐसी स्थिति में भी मुझे दोषी ठहराया जा सकता है, तो तुम भी दोषी हो।
 
Snake! Even after knowing all this how can you hold me guilty? And if even in such a situation I can be blamed, then you are also guilty.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)