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mahabharat 13.1.50: मृत्यु ने कहा, "हे सर्प! मैंने मृत्यु की प्रेरणा से ही तुम्हें इस बालक को डसने के लिए प्रेरित किया है; अतः इस बालक के विनाश के लिए न तो तुम उत्तरदायी हो और न मैं।"   |   mahabharat अध्याय 13.1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  13.1.50 
मृत्युरुवाच
प्रचोदितोऽहं कालेन पन्नग त्वामचूचुदम्।
विनाशहेतुर्नास्य त्वमहं न प्राणिन: शिशो:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
मृत्यु ने कहा, "हे सर्प! मैंने मृत्यु की प्रेरणा से ही तुम्हें इस बालक को डसने के लिए प्रेरित किया है; अतः इस बालक के विनाश के लिए न तो तुम उत्तरदायी हो और न मैं।"
 
Mrityu said, "Serpent! I inspired you to bite this child only due to the inspiration of death; hence neither you nor I am responsible for the destruction of this child." 50.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)