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mahabharat 13.1.5: मेरे ही कारण शत्रुओं ने युद्धभूमि में मेरे दादाजी की यह दशा कर दी। इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है?॥5॥   |   mahabharat अध्याय 13.1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  13.1.5 
अत: कष्टतरं किं नु मत्कृते यत् पितामह:।
इमामवस्थां गमित: प्रत्यमित्रै रणाजिरे॥ ५॥
 
 
अनुवाद
मेरे ही कारण शत्रुओं ने युद्धभूमि में मेरे दादाजी की यह दशा कर दी। इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है?॥5॥
 
Because of me the enemies brought my grandfather to this condition in the battle field. What can be more painful than this? ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)