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mahabharat 13.1.44: सर्प! तुम्हारे मतानुसार यदि किसी पाप कर्म का कर्ता उस पाप में सम्मिलित नहीं है, तो जो चोर या हत्यारे आदि अपने अपराधों के कारण राजाओं द्वारा मारे जाते हैं, उन्हें भी वास्तव में अपराधी या दोषी नहीं माना जाना चाहिए। (तब तो पाप और उसका दण्ड भी व्यर्थ हो जाएगा) तो फिर तुम इतनी बकवास क्यों कर रहे हो?   |   mahabharat अध्याय 13.1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.1.44 
असत्यपि कृते कार्ये नेह पन्नग लिप्यते।
तस्मान्नात्रैव हेतु: स्याद् वध्य: किं बहु भाषसे॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
सर्प! तुम्हारे मतानुसार यदि किसी पाप कर्म का कर्ता उस पाप में सम्मिलित नहीं है, तो जो चोर या हत्यारे आदि अपने अपराधों के कारण राजाओं द्वारा मारे जाते हैं, उन्हें भी वास्तव में अपराधी या दोषी नहीं माना जाना चाहिए। (तब तो पाप और उसका दण्ड भी व्यर्थ हो जाएगा) तो फिर तुम इतनी बकवास क्यों कर रहे हो?
 
Snake! According to your opinion, if the doer of an evil deed is not involved in that sin, then thieves or murderers etc. who are killed by kings due to their crimes should also not be considered criminals or guilty in reality. (Then the sin and its punishment will also be useless) So why are you talking so much nonsense.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)