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mahabharat 13.1.38: सर्प! जिस प्रकार मिट्टी के बर्तन बनाने में दण्ड और चक्र कारण माने जाते हैं, उसी प्रकार तुम भी इस बालक के वध का कारण हो ॥38॥   |   mahabharat अध्याय 13.1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  13.1.38 
मृत्पात्रस्य क्रियायां हि दण्डचक्रादयो यथा।
कारणत्वे प्रकल्प्यन्ते तथा त्वमपि पन्नग॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
सर्प! जिस प्रकार मिट्टी के बर्तन बनाने में दण्ड और चक्र कारण माने जाते हैं, उसी प्रकार तुम भी इस बालक के वध का कारण हो ॥38॥
 
Snake! Just as the rod and the wheel are considered to be the cause of making a clay pot, in the same way you are also the cause of the killing of this child. ॥ 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)