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mahabharat 13.1.34: उस समय वह सर्प अपने बंधन से पीड़ित होकर, धीरे-धीरे सांस लेता हुआ, बड़ी कठिनाई से अपने को नियंत्रित करता हुआ, धीमी मानवीय आवाज में बोला। 34.   |   mahabharat अध्याय 13.1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  13.1.34 
ईषदुच्छ्वसमानस्तु कृच्छ्रात् संस्तभ्य पन्नग:।
उत्ससर्ज गिरं मन्दां मानुषीं पाशपीडित:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
उस समय वह सर्प अपने बंधन से पीड़ित होकर, धीरे-धीरे सांस लेता हुआ, बड़ी कठिनाई से अपने को नियंत्रित करता हुआ, धीमी मानवीय आवाज में बोला। 34.
 
At that time the snake, suffering from its bondage, breathing slowly, controlled itself with great difficulty and spoke in a low human voice. 34.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)