Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.1.29: गौतमी बोली, "अर्जुनक! शत्रु को पकड़कर मार डालने से क्या लाभ है; तथा शत्रु को अपने वश में करके उसे न छोड़ने से कौन-सा अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध होता है? सौम्य! क्या कारण है कि मैं इस सर्प का अपराध क्षमा न करूँ? और इसे मुक्त करने का प्रयत्न क्यों न करूँ?" | mahabharat अध्याय 13.1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
गौतम्युवाच
का नु प्राप्तिर्गृह्य शत्रुं निहत्य
का कामाप्ति: प्राप्य शत्रुं न मुक्त्वा।
कस्मात् सौम्याहं न क्षमे नो भुजङ्गे
मोक्षार्थं वा कस्य हेतोर्न कुर्याम्॥ २९॥
अनुवाद
गौतमी बोली, "अर्जुनक! शत्रु को पकड़कर मार डालने से क्या लाभ है; तथा शत्रु को अपने वश में करके उसे न छोड़ने से कौन-सा अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध होता है? सौम्य! क्या कारण है कि मैं इस सर्प का अपराध क्षमा न करूँ? और इसे मुक्त करने का प्रयत्न क्यों न करूँ?"
Gautami said, "Arjunak! What is the benefit of capturing the enemy and killing him; and what desired purpose is achieved by not releasing the enemy after having him in your hands? Soumya! What is the reason that I should not forgive the crime of this snake? And why should I not try to free it?"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥