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mahabharat 13.1.27: ब्राह्मण क्रोध नहीं करते; फिर क्रोध से दूसरों को कैसे कष्ट दे सकते हैं? इसलिए हे मुनि! आप भी कोमलता का आश्रय लेकर इस सर्प के पाप को क्षमा कर दीजिए और इसे जाने दीजिए॥27॥   |   mahabharat अध्याय 13.1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 1: युधिष्ठिरको सान्त्वना देनेके लिये भीष्मजीके द्वारा गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादका वर्णन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  13.1.27 
न ब्राह्मणानां कोपोऽस्ति कुत: कोपाच्च यातनाम्।
मार्दवात् क्षम्यतां साधो मुच्यतामेष पन्नग:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण क्रोध नहीं करते; फिर क्रोध से दूसरों को कैसे कष्ट दे सकते हैं? इसलिए हे मुनि! आप भी कोमलता का आश्रय लेकर इस सर्प के पाप को क्षमा कर दीजिए और इसे जाने दीजिए॥27॥
 
Brahmins do not get angry; then how can they hurt others out of anger? Therefore, O saint! You too should forgive the sin of this snake by resorting to tenderness and let it go.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)