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mahabharat 12.98.d17-d23: इन्द्र कहते हैं - राजन! तब सुदेव ने पृथ्वी पर सिर रखकर महादेवजी को प्रणाम किया और इस प्रकार कहा - 'प्रभो! सुरेश्वर! मैं इस राक्षस सेना को युद्ध में नहीं हरा सकता; इसलिए मैं इस जीवन का त्याग करना चाहता हूँ। महादेव! जगत के स्वामी! मुझे शरण दीजिए। महाराज अम्बरीष अपने मन्त्रियों सहित मुझसे रुष्ट बैठे हैं। उन्होंने स्पष्ट आदेश दिया है कि इस सेना को पराजित किए बिना आप वापस न लौटें।' तब महादेवजी ने समस्त प्राणियों के कल्याण की इच्छा से पृथ्वी पर मुँह के बल लेटे हुए महामनस्वी सुदेव से कुछ कहना चाहा। पहले उन्होंने अपने गुणों और शरीर से धनुर्वेद का आह्वान किया और दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से सुशोभित रथ, हाथी और घोड़ों से युक्त सेना को बुलाया। इसके बाद उन्होंने वह महान सौभाग्यशाली रथ भी वहाँ प्रस्तुत किया, जिससे उन्होंने त्रिपुर का नाश किया था। फिर भगवान शंकर ने पिनाक नामक धनुष, अपनी तलवार और वह अस्त्र भी दिया, जिससे भगवान त्रिलोचन ने समस्त राक्षसों का वध किया था। तत्पश्चात महादेवजी ने सेनापति सुदेव से इस प्रकार कहा।   |   mahabharat अध्याय 12.98: इन्द्र और अम्बरीषके संवादमें नदी और यज्ञके रूपकोंका वर्णन तथा समरभूमिमें जूझते हुए मारे जानेवाले शूरवीरोंको उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका कथन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 98: इन्द्र और अम्बरीषके संवादमें नदी और यज्ञके रूपकोंका वर्णन तथा समरभूमिमें जूझते हुए मारे जानेवाले शूरवीरोंको उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका कथन  »  श्लोक d17-d23
 
 
श्लोक  12.98.d17-d23 
इन्द्र उवाच
स उवाच महादेवं शिरसा त्ववनीं गत:॥
भगवन् वाहिनीमेनां राक्षसानां सुरेश्वर।
अशक्तोऽहं रणे जेतुं तस्मात् त्यक्ष्यामि जीवितम्॥
गतिर्भव महादेव ममार्तस्य जगत‍्पते।
नागन्तव्यमजित्वा च मामाह जगतीपति:॥
अम्बरीषो महादेव क्षारित: सचिवै: सह।
तमुवाच महादेव: सुदेवं पतितं क्षितौ।
अधोमुखं महात्मानं सत्त्वानां हितकाम्यया॥
धनुर्वेदं समाहूय सगुणं सहविग्रहम्।
रथनागाश्वकलिलं दिव्यास्त्रसमलंकृतम्॥
रथं च सुमहाभागं येन तत् त्रिपुरं हतम्।
धनु: पिनाकं खड्गं च रौद्रमस्त्रं च शङ्कर:॥
निजघानासुरान् सर्वान् येन देवस्त्रयम्बक:।
उवाच च महादेव: सुदेवं वाहिनीपतिम्॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र कहते हैं - राजन! तब सुदेव ने पृथ्वी पर सिर रखकर महादेवजी को प्रणाम किया और इस प्रकार कहा - 'प्रभो! सुरेश्वर! मैं इस राक्षस सेना को युद्ध में नहीं हरा सकता; इसलिए मैं इस जीवन का त्याग करना चाहता हूँ। महादेव! जगत के स्वामी! मुझे शरण दीजिए। महाराज अम्बरीष अपने मन्त्रियों सहित मुझसे रुष्ट बैठे हैं। उन्होंने स्पष्ट आदेश दिया है कि इस सेना को पराजित किए बिना आप वापस न लौटें।' तब महादेवजी ने समस्त प्राणियों के कल्याण की इच्छा से पृथ्वी पर मुँह के बल लेटे हुए महामनस्वी सुदेव से कुछ कहना चाहा। पहले उन्होंने अपने गुणों और शरीर से धनुर्वेद का आह्वान किया और दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से सुशोभित रथ, हाथी और घोड़ों से युक्त सेना को बुलाया। इसके बाद उन्होंने वह महान सौभाग्यशाली रथ भी वहाँ प्रस्तुत किया, जिससे उन्होंने त्रिपुर का नाश किया था। फिर भगवान शंकर ने पिनाक नामक धनुष, अपनी तलवार और वह अस्त्र भी दिया, जिससे भगवान त्रिलोचन ने समस्त राक्षसों का वध किया था। तत्पश्चात महादेवजी ने सेनापति सुदेव से इस प्रकार कहा।
 
Indra says - King! Then Sudeva bowed down to Mahadevji by placing his head on the earth and said thus - 'Lord! Sureshwar! I cannot defeat this demon army in the war; therefore I want to give up this life. Mahadev! Lord of the world! Please give me shelter. Maharaj Ambrish along with his ministers are sitting angry with me. They have clearly ordered that you should not return without defeating this army.' Then Mahadevji wished to say something to the great-minded Sudeva who was lying face down on the earth, with the desire of welfare of all living beings. First he called Dhanurveda with his qualities and body and called the army full of chariots, elephants and horses, which was adorned with divine weapons. After this he also presented that great fortunate chariot there, with which he had destroyed Tripura. Then Lord Shankar also gave the bow named Pinak, his sword and the weapon with which Lord Trilochan had killed all the demons. Thereafter Mahadevji said to commander Sudev thus.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)