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mahabharat 12.98.45-46h: युद्ध में मारे गए योद्धा के लिए उसके बंधु-बांधव न तो स्नान करना चाहते हैं, न ही कोई अपवित्र कर्म करना चाहते हैं, न ही श्राद्ध या तर्पण करना चाहते हैं। उसे जो लोक प्राप्त होते हैं, उनके विषय में मुझसे सुनो॥ 45 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.98: इन्द्र और अम्बरीषके संवादमें नदी और यज्ञके रूपकोंका वर्णन तथा समरभूमिमें जूझते हुए मारे जानेवाले शूरवीरोंको उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका कथन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 98: इन्द्र और अम्बरीषके संवादमें नदी और यज्ञके रूपकोंका वर्णन तथा समरभूमिमें जूझते हुए मारे जानेवाले शूरवीरोंको उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका कथन  »  श्लोक 45-46h
 
 
श्लोक  12.98.45-46h 
न ह्यन्नं नोदकं तस्य न स्नानं नाप्यशौचकम्॥ ४५॥
हतस्य कर्तुमिच्छन्ति तस्य लोकान् शृणुष्व मे।
 
 
अनुवाद
युद्ध में मारे गए योद्धा के लिए उसके बंधु-बांधव न तो स्नान करना चाहते हैं, न ही कोई अपवित्र कर्म करना चाहते हैं, न ही श्राद्ध या तर्पण करना चाहते हैं। उसे जो लोक प्राप्त होते हैं, उनके विषय में मुझसे सुनो॥ 45 1/2॥
 
For a warrior killed in battle, his relatives do not wish to bathe, nor perform any ritual related to impurity, nor do they wish to offer food (shraadh) or water (tarpan). Listen to me about the worlds he attains. ॥ 45 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)