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mahabharat 12.98.43-44h: जो शत्रु के सेनापति, उसके पुत्र अथवा उस ओर के किसी भी प्रतिष्ठित योद्धा को जीवित पकड़ लेता है, वह मेरे समान लोक को प्राप्त होता है ॥43 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.98: इन्द्र और अम्बरीषके संवादमें नदी और यज्ञके रूपकोंका वर्णन तथा समरभूमिमें जूझते हुए मारे जानेवाले शूरवीरोंको उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका कथन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 98: इन्द्र और अम्बरीषके संवादमें नदी और यज्ञके रूपकोंका वर्णन तथा समरभूमिमें जूझते हुए मारे जानेवाले शूरवीरोंको उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका कथन  »  श्लोक 43-44h
 
 
श्लोक  12.98.43-44h 
नायकं तत्कुमारं वा यो वा स्याद् यत्र पूजित:॥ ४३॥
जीवग्राहं प्रगृह्णाति तस्य लोका यथा मम।
 
 
अनुवाद
जो शत्रु के सेनापति, उसके पुत्र अथवा उस ओर के किसी भी प्रतिष्ठित योद्धा को जीवित पकड़ लेता है, वह मेरे समान लोक को प्राप्त होता है ॥43 1/2॥
 
One who captures the enemy's commander, his son, or any respected warrior from that side alive, attains a world like mine. ॥ 43 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)