श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 98: इन्द्र और अम्बरीषके संवादमें नदी और यज्ञके रूपकोंका वर्णन तथा समरभूमिमें जूझते हुए मारे जानेवाले शूरवीरोंको उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका कथन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.98.18 
चापवेगायतस्तीक्ष्ण: परकायावभेदन:।
ऋजु: सुनिशित: पीत: सायकश्च स्रुवो महान्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जो तीक्ष्ण, सीधा, नुकीला और जलयुक्त बाण धनुष के बल से दूर-दूर तक जाता है और विशाल रूप धारण कर लेता है, वही यजमान के हाथ में धारण किया हुआ महान बाण है ॥18॥
 
The sharp, straight, pointed and watery arrow that travels far and wide with the force of the bow and assumes a huge form, is the great arrow in the hand of the host. ॥18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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