श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 97: शूरवीर क्षत्रियोंके कर्तव्यका तथा उनकी आत्मशुद्धि और सद्‍गतिका वर्णन  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  12.97.6-7 
यथैव क्षेत्रनिर्याता निर्यातं क्षेत्रमेव च।
हिनस्ति धान्यं कक्षं च न च धान्यं विनश्यति॥ ६॥
एवं शस्त्राणि मुञ्चन्तो घ्नन्ति वध्याननेकधा।
तस्यैषां निष्कृति: कृत्स्ना भूतानां भावनं पुन:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जैसे किसान खेत की निराई-गुड़ाई करके घास आदि सहित बहुत से धान के पौधों को काट डालता है, तब भी धान नष्ट नहीं होता (प्रत्युत निराई-गुड़ाई करने पर उसकी उपज बढ़ जाती है) उसी प्रकार युद्ध में जब राजा के सैनिक नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करके अपने शत्रुओं को मार डालते हैं, तब राजा के उस कृत्य का पूर्ण प्रायश्चित यही है कि युद्ध के पश्चात् वह पुनः उस राज्य की प्रजा को सब प्रकार से समृद्ध करे।
 
Just as a farmer weeds the field and cuts off many paddy plants along with the grass etc., even then the paddy is not destroyed (on the contrary, its yield increases after weeding). Similarly, in a war, when the king's soldiers kill their enemies in many ways by using various types of weapons, the only complete atonement for that act of the king is that after the war, he should again make the people of that kingdom prosper in every way. 6-7.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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