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mahabharat 12.97.5: वे दान, यज्ञ और तप के बल से अपने समस्त पापों का नाश कर देते हैं; फिर प्राणियों पर उपकार करने के लिए उनका पुण्य बढ़ जाता है ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.97: शूरवीर क्षत्रियोंके कर्तव्यका तथा उनकी आत्मशुद्धि और सद्‍गतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 97: शूरवीर क्षत्रियोंके कर्तव्यका तथा उनकी आत्मशुद्धि और सद्‍गतिका वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.97.5 
अपविध्यन्ति पापानि दानयज्ञतपोबलै:।
अनुग्रहाय भूतानां पुण्यमेषां विवर्धते॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वे दान, यज्ञ और तप के बल से अपने समस्त पापों का नाश कर देते हैं; फिर प्राणियों पर उपकार करने के लिए उनका पुण्य बढ़ जाता है ॥5॥
 
They destroy all their sins by the power of charity, sacrifices and austerities; then their merits increase for bestowing favours on beings. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)