vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 97: शूरवीर क्षत्रियोंके कर्तव्यका तथा उनकी आत्मशुद्धि और सद्गतिका वर्णन
»
श्लोक 5
श्लोक
12.97.5
अपविध्यन्ति पापानि दानयज्ञतपोबलै:।
अनुग्रहाय भूतानां पुण्यमेषां विवर्धते॥ ५॥
अनुवाद
वे दान, यज्ञ और तप के बल से अपने समस्त पापों का नाश कर देते हैं; फिर प्राणियों पर उपकार करने के लिए उनका पुण्य बढ़ जाता है ॥5॥
They destroy all their sins by the power of charity, sacrifices and austerities; then their merits increase for bestowing favours on beings. ॥ 5॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×