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यत्र यत्र हत: शूर: शत्रुभि: परिवारित:।
अक्षयाँल्लभते लोकान् यदि दैन्यं न सेवते॥ ३२॥
अनुवाद
यदि शत्रुओं से घिरा हुआ वीर योद्धा अपने मन में दीनता अनुभव न करे, तो वह जहाँ भी मारा जाए, वहाँ अनन्त लोकों को प्राप्त करता है। 32.
If a valiant warrior surrounded by enemies does not feel lowly in spirit, then wherever he is slain he attains eternal worlds. 32.
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सप्तनवतितमोऽध्याय:॥ ९७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९७॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥