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श्लोक 12.97.32  |
यत्र यत्र हत: शूर: शत्रुभि: परिवारित:।
अक्षयाँल्लभते लोकान् यदि दैन्यं न सेवते॥ ३२॥ |
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| अनुवाद |
| यदि शत्रुओं से घिरा हुआ वीर योद्धा अपने मन में दीनता अनुभव न करे, तो वह जहाँ भी मारा जाए, वहाँ अनन्त लोकों को प्राप्त करता है। 32. |
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| If a valiant warrior surrounded by enemies does not feel lowly in spirit, then wherever he is slain he attains eternal worlds. 32. |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सप्तनवतितमोऽध्याय:॥ ९७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९७॥
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