श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 97: शूरवीर क्षत्रियोंके कर्तव्यका तथा उनकी आत्मशुद्धि और सद्‍गतिका वर्णन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.97.28 
रणेषु कदनं कृत्वा ज्ञातिभि: परिवारित:।
तीक्ष्णै: शस्त्रैरभिक्लिष्ट: क्षत्रियो मृत्युमर्हति॥ २८॥
 
 
अनुवाद
क्षत्रिय अपने बन्धु-बान्धवों से घिरा हुआ युद्धस्थल में महान् संहार करता हुआ तीक्ष्ण शस्त्रों से अत्यन्त कष्ट पाकर प्राण त्याग दे - वह ऐसी ही मृत्यु के योग्य है ॥28॥
 
A Kshatriya should, surrounded by his kinsmen and wreaking great havoc in the battlefield, suffer greatly from sharp weapons and give up his life - he is worthy of such a death. 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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