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mahabharat 12.97.23-24: क्षत्रिय का खाट पर सोते हुए मरना पाप है। जो क्षत्रिय कफ, मूत्र और मल त्याग करता हुआ तथा शोक से विलाप करता हुआ बिना घायल हुए मरता है, उसके कर्म की प्राचीन धर्म को जानने वाले विद्वान पुरुष प्रशंसा नहीं करते। ॥23-24॥   |   mahabharat अध्याय 12.97: शूरवीर क्षत्रियोंके कर्तव्यका तथा उनकी आत्मशुद्धि और सद्‍गतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 97: शूरवीर क्षत्रियोंके कर्तव्यका तथा उनकी आत्मशुद्धि और सद्‍गतिका वर्णन  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  12.97.23-24 
अधर्म: क्षत्रियस्यैष यच्छय्यामरणं भवेत्।
विसृजन् श्लेष्ममूत्राणि कृपणं परिदेवयन्॥ २३॥
अविक्षतेन देहेन प्रलयं योऽधिगच्छति।
क्षत्रियो नास्य तत् कर्म प्रशंसन्ति पुराविद:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
क्षत्रिय का खाट पर सोते हुए मरना पाप है। जो क्षत्रिय कफ, मूत्र और मल त्याग करता हुआ तथा शोक से विलाप करता हुआ बिना घायल हुए मरता है, उसके कर्म की प्राचीन धर्म को जानने वाले विद्वान पुरुष प्रशंसा नहीं करते। ॥23-24॥
 
It is a sin for a Kshatriya to die while sleeping on a cot. The learned men who know the ancient Dharma do not praise the act of a Kshatriya who dies without getting injured while excreting phlegm and urine and stools and while wailing in sorrow. ॥23-24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)