श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 97: शूरवीर क्षत्रियोंके कर्तव्यका तथा उनकी आत्मशुद्धि और सद्‍गतिका वर्णन  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  12.97.21-22 
अस्वस्ति तेभ्य: कुर्वन्ति देवा इन्द्रपुरोगमा:।
त्यागेन य: सहायानां स्वान् प्राणांस्त्रातुमिच्छति॥ २१॥
तं हन्यु: काष्ठलोष्ठैर्वा दहेयुर्वा कटाग्निना।
पशुवन्मारयेयुर्वा क्षत्रिया ये स्युरीदृशा:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र आदि देवता उन्हें शाप देते हैं। जो कायर अपने सहायकों को त्यागकर अपने प्राण बचाना चाहता है, उसे अपने साथी क्षत्रियों द्वारा लाठियों या पत्थरों से पीटा जाना चाहिए अथवा घास के ढेर की आग में जला दिया जाना चाहिए अथवा पशु की भाँति गला घोंटकर मार दिया जाना चाहिए। 21-22.
 
Gods like Indra etc. curse them. A coward who wants to save his life by abandoning his helpers should be beaten by his fellow Kshatriyas with sticks or stones or should be burned in the fire of a heap of grass or should be strangled to death like an animal. 21-22.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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