श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 97: शूरवीर क्षत्रियोंके कर्तव्यका तथा उनकी आत्मशुद्धि और सद्‍गतिका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.97.1 
युधिष्ठिर उवाच
क्षत्रधर्माद्धि पापीयान्न धर्मोऽस्ति नराधिप।
अपयानेन युद्धेन राजा हन्ति महाजनम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा, "हे राजन! क्षत्रिय धर्म से बढ़कर कोई पाप नहीं है, क्योंकि राजा किसी देश पर आक्रमण करके तथा युद्ध करके महान जनसंहार करता है।"
 
Yudhishthira asked, "O Lord of kings! There is no religion more sinful than the kshatriya religion because by attacking a country and waging a war, a king causes great massacre of people."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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