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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 96: राजाके छलरहित धर्मयुक्त बर्तावकी प्रशंसा
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श्लोक 24
श्लोक
12.96.24
सर्वविद्यातिरेकेण जयमिच्छेन्महीपति:।
न मायया न दम्भेन य इच्छेद् भूतिमात्मन:॥ २४॥
अनुवाद
जो राजा अपनी कीर्ति बढ़ाना चाहता है, उसे दंभ या कपट से नहीं, अपितु सम्पूर्ण विद्याओं में निपुण होकर विजय की आकांक्षा करनी चाहिए ॥24॥
A king who wishes to increase his glory should aspire to victory by excelling in all knowledge, not by conceit or hypocrisy. ॥24॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि विजिगीषमाणवृत्ते षण्णवतितमोऽध्याय:॥ ९६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें विजयाभिलाषी राजाका बर्तावविषयक छियानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९६॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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