श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 96: राजाके छलरहित धर्मयुक्त बर्तावकी प्रशंसा  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.96.1 
भीष्म उवाच
नाधर्मेण महीं जेतुं लिप्सेत जगतीपति:।
अधर्मविजयं लब्ध्वा को नु मन्येत भूमिप:॥ १॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - युधिष्ठिर! किसी भी राजा को अधर्म से पृथ्वी पर विजय प्राप्त करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। अधर्म से जीतकर कौन राजा सम्मान पा सकता है?॥1॥
 
Bhishma says - Yudhishthira! No king should ever wish to conquer the earth by unrighteous means. Which king can be respected by winning by unrighteous means?॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)