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mahabharat 12.95.4: नरेश्वर! यदि वे क्षत्रिय न होते हुए भी किसी प्रकार विरोध करते हैं, तो जातिविरुद्ध कर्म करने वाले उन सभी लोगों का हर प्रकार से दमन करना चाहिए॥4॥   |   mahabharat अध्याय 12.95: विजयाभिलाषी राजाके धर्मानुकूल बर्ताव तथा युद्धनीतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 95: विजयाभिलाषी राजाके धर्मानुकूल बर्ताव तथा युद्धनीतिका वर्णन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.95.4 
ते चेदक्षत्रिया: सन्तो विरुध्येरन् कथंचन।
सर्वोपायैर्नियन्तव्या विकर्मस्था नराधिप॥ ४॥
 
 
अनुवाद
नरेश्वर! यदि वे क्षत्रिय न होते हुए भी किसी प्रकार विरोध करते हैं, तो जातिविरुद्ध कर्म करने वाले उन सभी लोगों का हर प्रकार से दमन करना चाहिए॥4॥
 
Nareshwar! If they protest in any way despite not being Kshatriyas, then all those people engaged in activities contrary to caste should be suppressed by all means. 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)