श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 95: विजयाभिलाषी राजाके धर्मानुकूल बर्ताव तथा युद्धनीतिका वर्णन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.95.22 
अथैनमभिनिन्दन्ति भिन्नं कुम्भमिवाश्मनि।
तस्माद् धर्मेण विजयं कोशं लिप्सेत भूमिप:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जैसे घड़ा पत्थर पर पटकने से टुकड़े-टुकड़े हो जाता है और सब लोग उसकी निन्दा करते हैं; इसलिए राजा को चाहिए कि वह धर्मपूर्वक धन और विजय की प्राप्ति की आकांक्षा करे ॥22॥
 
Like a pot banged on a stone, it breaks into pieces and everyone criticizes him; therefore, the king must aspire to acquire wealth and victory in a righteous manner. ॥22॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि विजिगीषमाणवृत्ते पञ्चनवतितमोऽध्याय:॥ ९५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें विजयाभिलाषी राजाका बर्तावविषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)