श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 95: विजयाभिलाषी राजाके धर्मानुकूल बर्ताव तथा युद्धनीतिका वर्णन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.95.21 
महादृतिरिवाध्मात: सुकृते नैव वर्तते।
तत: समूलो ह्रियते नदीं कूलादिव द्रुम:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
जैसे चमड़े का थैला हवा से भर जाने पर फूल जाता है, वैसे ही पापी भी पापों के कारण फूल जाता है। वह कभी पुण्य कर्मों में प्रवृत्त नहीं होता। तत्पश्चात, जैसे नदी के किनारे खड़ा वृक्ष जड़ सहित उखड़कर नदी में बह जाता है, वैसे ही वह पापी भी पूर्णतः नष्ट हो जाता है॥ 21॥
 
Just as a leather bag swells up when filled with air, similarly a sinner also swells up due to sins. He never indulges in pious deeds. Thereafter, just as a tree standing on the bank of a river is uprooted along with its roots and is swept away in the river, similarly that sinner also gets completely destroyed.॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)