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mahabharat 12.95.18-20: पापी मनुष्य पाप कर्मों से धन पाकर हर्ष से फूल उठता है। वह पापी चोरी करके पाप में आसक्त हो जाता है और धर्म को नकारकर पुण्यात्माओं का उपहास करता है। धर्म में उसकी तनिक भी श्रद्धा नहीं रहती और पाप के कारण वह विनाश के मुख में गिर जाता है। वह देवताओं के समान अपने को अमर समझता है; किन्तु उसे वरुण के पाश में बंध जाना पड़ता है। (18-20)   |   mahabharat अध्याय 12.95: विजयाभिलाषी राजाके धर्मानुकूल बर्ताव तथा युद्धनीतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 95: विजयाभिलाषी राजाके धर्मानुकूल बर्ताव तथा युद्धनीतिका वर्णन  »  श्लोक 18-20
 
 
श्लोक  12.95.18-20 
पापेन कर्मणा वित्तं लब्ध्वा पाप: प्रहृष्यति॥ १८॥
स वर्धमान: स्तेयेन पाप: पापे प्रसज्जति।
न धर्मोऽस्तीति मन्वान: शुचीनवहसन्निव॥ १९॥
अश्रद्दधानश्च भवेद् विनाशमुपगच्छति।
सम्बद्धो वारुणै: पाशैरमर्त्य इव मन्यते॥ २०॥
 
 
अनुवाद
पापी मनुष्य पाप कर्मों से धन पाकर हर्ष से फूल उठता है। वह पापी चोरी करके पाप में आसक्त हो जाता है और धर्म को नकारकर पुण्यात्माओं का उपहास करता है। धर्म में उसकी तनिक भी श्रद्धा नहीं रहती और पाप के कारण वह विनाश के मुख में गिर जाता है। वह देवताओं के समान अपने को अमर समझता है; किन्तु उसे वरुण के पाश में बंध जाना पड़ता है। (18-20)
 
A sinful man blossoms with joy on getting wealth by sinful acts. That sinner, by stealing, gets addicted to sin and, thinking that Dharma does not exist, he makes fun of the pious men. He does not have even a little faith in Dharma and by sin he falls into the mouth of destruction. He thinks himself immortal like the gods; but he has to be bound in the noose of Varuna. 18-20.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)