Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.95.17-18h: हे राजन! जिस प्रकार भूमि में बोए गए बीज का फल तुरन्त नहीं मिलता, उसी प्रकार पाप का फल तुरन्त नहीं मिलता; परन्तु जब फल मिलता है, तो जड़ और शाखा दोनों को जलाकर राख कर देता है।   |   mahabharat अध्याय 12.95: विजयाभिलाषी राजाके धर्मानुकूल बर्ताव तथा युद्धनीतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 95: विजयाभिलाषी राजाके धर्मानुकूल बर्ताव तथा युद्धनीतिका वर्णन  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  12.95.17-18h 
नाधर्मश्चरितो राजन् सद्य: फलति गौरिव॥ १७॥
मूलानि च प्रशाखाश्च दहन् समधिगच्छति।
 
 
अनुवाद
हे राजन! जिस प्रकार भूमि में बोए गए बीज का फल तुरन्त नहीं मिलता, उसी प्रकार पाप का फल तुरन्त नहीं मिलता; परन्तु जब फल मिलता है, तो जड़ और शाखा दोनों को जलाकर राख कर देता है।
 
King! Just as the fruit of a seed sown in the earth is not immediately obtained, similarly the fruit of a sin committed does not appear immediately; but when the fruit appears, it burns both the root and the branch to ashes.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)