| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 94: वामदेवके उपदेशमें राजा और राज्यके लिये हितकर बर्ताव » श्लोक 8 |
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| | | | श्लोक 12.94.8  | तक्षेदात्मानमेवं स वनं परशुना यथा।
य: सम्यग् वर्तमानेषु स्वेषु मिथ्या प्रवर्तते॥ ८॥ | | | | | | अनुवाद | | जो अपने साथ अच्छा व्यवहार करनेवाले अपने सम्बन्धियों के साथ बुरा व्यवहार करता है, वह अपने ही व्यवहार से स्वयं को उसी प्रकार नष्ट कर लेता है, जैसे कुल्हाड़ी से जंगल नष्ट हो जाता है ॥8॥ | | | | He who misbehaves with his relatives who behave well with him, by this behaviour destroys himself like a forest is destroyed with an axe. ॥ 8॥ | | ✨ ai-generated | | |
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