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mahabharat 12.93.38: जो पापी मनुष्य अपने उस स्वामी को, जो सर्वगुण संपन्न है और सदैव मधुर वचन बोलता है, बिना किसी कारण के धोखा देता है, उसका कभी विश्वास नहीं करना चाहिए ॥38॥   |   mahabharat अध्याय 12.93: वामदेवजीके द्वारा राजोचित बर्तावका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 93: वामदेवजीके द्वारा राजोचित बर्तावका वर्णन  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  12.93.38 
अपि सर्वगुणैर्युक्तं भर्तारं प्रियवादिनम्।
अभिद्रुह्यति पापात्मा न तस्माद् विश्वसेज्जनात्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
जो पापी मनुष्य अपने उस स्वामी को, जो सर्वगुण संपन्न है और सदैव मधुर वचन बोलता है, बिना किसी कारण के धोखा देता है, उसका कभी विश्वास नहीं करना चाहिए ॥38॥
 
A sinful person who betrays his master who is endowed with all virtues and always speaks sweet words, without any reason, should never be trusted. ॥ 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)