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mahabharat 12.93.35: राजा को अनुचित समय पर कर लगाकर धन संग्रह करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। अप्रिय कार्य के पूर्ण होने पर चिन्ता की अग्नि में नहीं जलना चाहिए और सुखद कार्य के पूर्ण होने पर अति प्रसन्न नहीं होना चाहिए तथा अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।॥35॥   |   mahabharat अध्याय 12.93: वामदेवजीके द्वारा राजोचित बर्तावका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 93: वामदेवजीके द्वारा राजोचित बर्तावका वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.93.35 
नाकाले प्रणयेदर्थान्नाप्रिये जातु संज्वरेत्।
प्रिये नातिभृशं तुष्येद् युज्येतारोग्यकर्मणि॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
राजा को अनुचित समय पर कर लगाकर धन संग्रह करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। अप्रिय कार्य के पूर्ण होने पर चिन्ता की अग्नि में नहीं जलना चाहिए और सुखद कार्य के पूर्ण होने पर अति प्रसन्न नहीं होना चाहिए तथा अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।॥35॥
 
The king should not try to collect wealth by imposing taxes at inappropriate times. He should never burn in the fire of worry on completion of an unpleasant task and should not be overjoyed on completion of a pleasant task and should always be ready to keep his body healthy.॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)