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mahabharat 12.93.29-30: जो अपनी प्रतिकूल बुद्धि के कारण अपने ही उद्देश्य की प्राप्ति चाहने वाले हितैषी पुरुष के वचनों को सहन नहीं करता तथा अपने ही उद्देश्य के विरुद्ध वचनों को भी सुनता है, सदैव अनिच्छुक रहता है, जो बुद्धिमान् और विनम्र पुरुषों के आचरण का सदैव पालन नहीं करता तथा पराजित अथवा अपराजित लोगों को भी अपने परम्परागत आचरण का पालन नहीं करने देता, वह क्षत्रिय धर्म से गिर जाता है ॥29-30॥   |   mahabharat अध्याय 12.93: वामदेवजीके द्वारा राजोचित बर्तावका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 93: वामदेवजीके द्वारा राजोचित बर्तावका वर्णन  »  श्लोक 29-30
 
 
श्लोक  12.93.29-30 
योऽर्थकामस्य वचनं प्रातिकूल्यान्न मृष्यते।
शृणोति प्रतिकूलानि सर्वदा विमना इव॥ २९॥
अग्राम्यचरितां वृत्तिं यो न सेवेत नित्यदा।
जितानामजितानां च क्षत्रधर्मादपैति स:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
जो अपनी प्रतिकूल बुद्धि के कारण अपने ही उद्देश्य की प्राप्ति चाहने वाले हितैषी पुरुष के वचनों को सहन नहीं करता तथा अपने ही उद्देश्य के विरुद्ध वचनों को भी सुनता है, सदैव अनिच्छुक रहता है, जो बुद्धिमान् और विनम्र पुरुषों के आचरण का सदैव पालन नहीं करता तथा पराजित अथवा अपराजित लोगों को भी अपने परम्परागत आचरण का पालन नहीं करने देता, वह क्षत्रिय धर्म से गिर जाता है ॥29-30॥
 
One who, due to his unfavorable mind, does not tolerate the words of a well-meaning person who wants to achieve his own goals and also listens to the words that are against his own goals, always remains reluctant, who does not always follow the behavior practiced by wise and polite people and does not allow the defeated or undefeated people to follow their traditional conduct, he falls from Kshatriya Dharma. 29-30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)