श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 92: राजाके धर्मपूर्वक आचारके विषयमें वामदेवजीका वसुमनाको उपदेश  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.92.4 
धर्मार्थसहितैर्वाक्यैर्भगवन्ननुशाधि माम्।
येन वृत्तेन वै तिष्ठन् न हीयेयं स्वधर्मत:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! मुझे किस आचरण का पालन करना चाहिए जिससे मैं अपने धर्म से कभी च्युत न हो जाऊँ? कृपया अपने अर्थपूर्ण एवं धर्मपूर्ण वचनों द्वारा मुझे यह सिखाइए।॥4॥
 
'Lord! What conduct should I follow so that I never fall from my Dharma? Please teach me this through your meaningful and Dharma-filled words.'॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)