श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 92: राजाके धर्मपूर्वक आचारके विषयमें वामदेवजीका वसुमनाको उपदेश  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.92.17 
अथ मानयितुर्दाम्न: श्लक्ष्णस्य वशवर्तिन:।
व्यसनं स्वमिवोत्पन्नं विजिघांसन्ति मानवा:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जो सबका आदर करता है, उदार है, स्नेही है और दूसरों के अधीन है, यदि उस पर कोई विपत्ति आ पड़े, तो सब लोग उसे अपनी विपत्ति समझकर उसे कम करने का प्रयत्न करते हैं ॥17॥
 
If a person who respects everyone, is generous, affectionate and subservient to others is faced with a calamity, everyone considers it as their own calamity and tries to mitigate it. ॥17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)